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<distributor>UCREL (on behalf of CIIL)</distributor>
<pubAddress>Department of Linguistics, Lancaster University, Lancaster, LA1 4YT, UK</pubAddress>
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<pubDate>03-07-27</pubDate>
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<h.title>Kheti</h.title>
<h.author>Jagadish Prasad Chaturvedi</h.author>
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<pubPlace>India</pubPlace>
<publisher>Unknown - Bhartiya Krishi Anusandhan Parishad - New Delhi</publisher>
<pubDate>1982</pubDate>
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<projectDesc>Text collected for the CIIL Corpus, subsequently integrated into the EMILLE/CIIL Monolingual Written Corpora.</projectDesc>
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<creation><date>03-07-27</date></creation>
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<p>&lt;2100&gt;&lt;Jagdish Prasad-Kheti&gt;&lt;Dhananjay Kumar&gt;</p>

<p>&lt;कृषि आर्थिकी
विश्व का अन्न भण्डार और भारत
जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी
सुप्रसिद्ध पत्रकार तथा भा.कृ.अ.
प.प्रकाशन समिति के सदस्य,
55, काका नगर, नई दिल्ली</p>

<p>भारत ने कृषि के क्षेत्र में कितनी प्रगति की है, उसकी तुलना में भारत के
पडोसियों की स्थिति कैसी है और संसार के बड़े-बड़े कृषि उत्पादकों के उत्पादन की
यदि हम तुलना करें, तो यह पता चलता है कि भारत ने पिछले वर्षों में कृषि के
क्षेत्र में बहुत उन्नति की है। अगर हम पिछले पांच वर्षों की ही तुलना करें तो
1977-78 में संसार में 24 करोड 70 लाख टन चावल, 29 करोड़ 10 लाख टन गेहूं और 71
करोड 70 लाख टन मोटा अनाज पैदा हुआ था, यानी कुल मिलाकर 1 अरब 35 करोड़ 50 लाख
टन अनाज पैदा हुआ। अगले वर्ष यह मात्रा 1 अरब 47 करोड़ हो गई, 1979-80 में
गिर-~कर 1 अरब 43 करोड़ 30 लाख टन रह गई। 1980-81 में इसमें 10 लाख टन की और कमी
हो गई। लेकिन 1981-82 के लिए अनुमान लगाया जा रहा है कि वह एक अरब 52 करोड़ 20
लाख टन होगी, यानि पिछले वर्ष की अपेक्षा 6 प्रतिशत की बृद्धि होगी। इससे चावल
की 3 प्रतिशत की, गेहूं में 3 प्रतिशत की ओर मोटे अनाज में 10 प्रतिशत की
बृद्धि होगी।
अन्न शक्ति में आगे कौन
विकासशील देश संख्या में अधिक हैं,परन्तु 1981-82 में उनमें 67 करोड़ 60 लाख टन
अन्न के उत्पादन का अनुमान है, जबकि विकसित देशों का यह अनुमान 84 करोड़ 60 लाख
टन है। इससे यह पता लगता है कि विकासशील देशों में केवल 5 प्रतिशत की बृद्धि
हुई, जब कि विकसित देशों में 7 प्रतिशत की। और जो देश बहुत ही कम आय वाले समझे
जाते हैं, उनमें तो खेती का विकास और भी कम हुआ, यानी उनके उत्पादन में केवल 3
प्रति-~शत की। ये वे देश हैं, जिनकी प्रति व्यक्ति आय 1979 में अमरीकी 370 डालर
से कम थी। इसका अर्थ होता है कि जिनकी भार-~तीय हिसाब से प्रतिव्यक्ति आय 2,500
रू. से कम की हो। इस दृष्टि से जब भारत की तुलना हम पिछले कई वर्षों के इतिहास
में करते हैं, तो पता चलता है कि भारत ने काफी प्रगति की है। यह प्रगति केवल इस
कारण नहीं हुई कि भारत ने अपेक्षाकृत अधिक भूमि को खेती के काम में लिया, बल्कि
इसलिए हुई कि प्रति हैक्टर उत्पादन में बृद्धि हुई। यदि हम एशिया को ही ध्यान
में रखें तो सन् 1970 में भारत खाद्यान्न की खेती करने वाला सबसे वाला
देश था जिसका 10 करोड़ 4 लाख हैक्टर क्षेत्रफल अन्न उत्पादन करता है। चीन
में 8 करोड़ 81 लाख, इन्डोनेशिया में 1 करोड़ 11 लाख बंगला देश में 1 करोड़
1 लाख, पाकिस्तान में 98 लाख, थाईलैंड में 75 लाख, वर्मा में 52 लाख
और जापान में 34 लाख हैक्टर में खाद्यान्न उत्पादन होता था। कोरिया में 22 लाख
और फिलीपीन में 55 लाख हैक्टर में तथा निकटपूर्व के अन्य सभी देशों मे कुल
मिलाकर 1 करोड़ 43 लाख हैक्टर भूमि में यह उत्पादन होता था। सन् 1980 में स्थिति
यह थी कि भारत का क्षेत्रफल, जो 1971,1972,1974 में 1970 के स्तर से धट गया था,
1980 में 10 करोड़ 35 लाख हो गया। इस बीच चीन ने अपना क्षेत्रफल बढ़ाकर 10 करोड़
25 लाख हैक्टर कर लिया। बंगला देश में 1 करोड़ 9 लाख हैक्टर ही हुआ, वर्मा में
54 लाख हैक्टर ही, इन्डो-~नेसिया में 1 करोड़ 19 लाख, जापान में गिरकर 27 लाख
रह गया और कोरिया गणराज्य में 16 लाख। पाकिस्तान में बढ़-~कर 1 करोड़ 7 लाख हो
गया। फिलीपीन में 67 लाख, थाईलैंड में 1 करोड़ 10 लाख और अन्य क्षेत्रों में 1
करोड़ 46 लाख। यदि संसार के बड़े खाद्य उत्पादन देशों के साथ इन की तुलना की
जाय, तो पता चलता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में खाद्य का उत्पादन 5 करोड़ 91
लाख हैक्टर से बढ़कर 7 करोड़ 14 लाख हैक्टर में हो गया, कनाडा का 1 करोड़ 35
लाख से बढ़कर 1 करोड़ 91 लाख हैक्टर में हो गया, आस्ट्रेलिया का 1 करोड़ 6 लाख
से बढ़कर 1 करोड़ 55 लाख हैक्टर में हो गया और ब्राजील का 1 करोड़ 68 लाख हैक्टर
से बढ़कर 2 करोड़ 11 लाख हैक्टर हो गया। तुर्की में 1 करोड़ 32 लाख था और 1980
में भी उसी क्षेत्रफल में खाद्यान्न का उत्पादन होता था नाइजीरिया में अवश्य 1
करोड़ 25 लाख हैक्टर से बढ़कर 1 करोड़ 33 लाख हैक्टर में खाद्यान्न का
उत्पादन होने लगा।
सोवियत संघ में 11 करोड़ 42 लाख हेक्टर में खाद्यान्न का उप्पादन होता था और 10
वर्षों में यह क्षेत्रफल बढ़कर 12 करोड़ 19 लाख हो गया। इसकी तुलना में पश्चिमी
यूरोप में 4 करोड़ 66 लाख की अपेक्षा गिरकर 4 करोड़ 57 लाख रह गया और पूर्वी
यूरोप में 2 करोड़ 47 लाख से बढ़कर 2 करोड़ 48 लाख हो गया।
उत्पादन की दृष्टि से संसार में सबसे अधिक खाद्यान्न अमेरिका में पैदा हुआ, जहां
1970 में 18 करोड़ 56 लाख टन था, जो 1980 में बढ़कर 26 करोड़ 77 लाख टन हो गया।
उसके बाद चीन आता है जिसका उत्पादन 17 करोड़ 48 लाख टन से बढ़कर 23 करोड़ 59 लाख
टन हो गया। इसके बाद तीसरा नम्बर भारत का है, जहां 1970 में 9 करोड़ 28 लाख टन
का उत्पादन हुआ था, 1978 में बढ़कर 11 करोड़ 61 लाख टन हो गया और 1980 में 11
करोड़ 39 लाख टन हो गया। लेकिन यही उत्पादन 1981 में बढ़कर 13 करोड़ टन हो गया
और आशा है कि 1981-82 की फसल में यह 13 करोड़ 40 लाख टन हो जायगा।
कृषि उत्पादन में छलांगें
यदि इस उत्पादन को हम फसल के हिसाब से देखें, यानी गेहूं का कितना उत्पा-~दन
हुआ, चावल का कितना या मोटे अनाज का कितना, तो पता चलता है कि 1970 में 1980 तक
भारत में गैहूं के उत्पादन में इतनी बृद्धि की कि उसका उत्पादन 2 करोड़ 93 हजार
टन से बढ़कर 1980 में 3 करोड़ 18 लाख टन और 1981 में 3 करोड़ 60 लाख टन हो गया।
चीन ने 1970 के 3 करोड़ 10 लाख टन से अपना उत्पादन बढ़ाकर 5 करोड़ 41 लाख टन कर
लिया था। पाकिस्तान का उत्पादन 72 लाख टन से बढ़कर 1 करोड़ 8 लाख टन हो गया।
तुर्की का उत्पादन 1 करोड़ टन से बढ़कर 1 करोड़ 74 लाख टन हुआ। नाइजीरिया का
19 हजार से घटकर 15 हजार ही रह गया, अमेरिका का अवश्य 3 करोड़ 67 लाख से बढ़कर 6
करोड़ 44 लाख टन हो गया। सोवियत संघ का 9 करोड़ 97 लाख टन से घटकर 9 करोड़ 81
लाख रह गया और आस्ट्रेलिया का 79 लाख टन से बढ़कर 1 करोड़ 8 लाख टन हो गया।
कनाडा में बृद्धि काफी हुई, वह 90 लाख टन से बढ़कर 1 करोड़ 91 लाख टन हो गया।
बंगलादेश ने भी बहुत प्रगति की। वहां पहले जहां 1 लाख टन गेहूं होता था,वहां 12
लाख टन हुआ, परन्तु कुल खपत की दृष्टि से बंगला-~देश चावल अधिक पैदा करता
है। वहां पर 1970 में 1 करोड़ 67 लाख टन चावल हुआ था, 1980 में 2 करोड़ 11 लाख
टन हुआ। चीन में 11 करोड़ 27 लाख से बढ़-~ कर 14 करोड़ 22 लाख टन हुआ और भारत
में 6 करोड़ 33 लाख टन से बढ़कर 8 करोड़ टन हुआ।
चावल की दृष्टि से भारत चीन के बाद दूसरे नम्बर का देश हुआ। इन्डोनेशिया में 2
करोड़ 97 लाख टन चावल पैदा हुआ, थाईलेंड़ मे 1 करोड़ 73 लाख टन, ब्राजील में 96
लाख टन और अन्य देशों में और भी कम। चावल का 1980 में कुल उत्पादन 29 करोड़ 62
लाख टन था, जिसमें 37 करोड़ टन विकासशील देशों में था और कुल 24 लाख टन विकसित
देशों में।
खाद्य सहायता
विश्व में जो खाद्य- उत्पादन हो रहा है, उसके कारण खाद्य सहायता में कमी हुई है।
सन् 1970-71 में कुल 1 करोड़ 26 लाख टन गल्ला खाद्य सहायता के रूप में दिया गया
था, जो 1980-81 में गिरकर 85 लाख 64 हजार टन रह गया। खाद्य-सहा-~यता देने वालों
में प्रमुखता संयुक्त राज्य अमेरिका की थी, जिसने 1970-71 में 83 लाख 21 हजार टन
खाद्यान्न सहायता में दिया था, वह मात्रा गिरकर 51 लाख 41 हजार हो गई। यूरोपीय
समुदाय के देशों की खाद्य सहायता 12 लाख 87 हजार टन स बढ़कर 13 लाख टन हो गई।
कनाडा की खाद्य सहायता 1970-71 में 16 लाख 8 हजार टन थी, जो 1980-81 में 6 लाख
टन रह गई। आस्ट्रेलिया की जरूर 2 लाख 26 हजार टन से बढ़कर 4 लाख 3 हजार टन हो
गई। जापान की सहायता 7 लाख 29 हजार टन थी, जो गिरकर 5 लाख 67 हजार रह गई। चीन ने
1971-72 में 10 हजार टन और 1977-78 में 68 हजार टन की सहायता दी थी। 1978-79 मे
3 हजार टन, 1979-80 और 1981 में 25-25 हजार टन हो गई। भारत ने 1977-78 में दूसरे
देशों को 1 लाख टन, 1978-79 में 2 लाख 95 हजार टन, 1979-80 में 80 हजार टन और
1980-81 में 51 हजार टन सहायता दी। 1980-81 में सोवियत संघ में भारत को 20 लाख
टन और बंगलादेश को 2 लाख टन गेंहूं का ऋण दिया। जो कि गेहूं की शक्ल में ही
बापस होना था और अगले वर्ष वह ऋण चुका दिया।
कितना निर्यात : कितना आयात
खाद्यान्न की दृष्टि से कौन देश कितना आगे है और कौन कितना पीछे, इसका पता
व्यापार से भी लगता है कि किस देश ने खाद्यान का निर्यात किया और किस देश ने
आयात किया। जहां तक निर्यातक देशों का सम्बन्ध है, अमेरिका सबसे आगे है, जिसने
1970-71 में 4 करोड़ टन का 1980-81 में 11 करोड़ 72 लाख टन का निर्यात किया था।
कनाडा में 1970-71 में 1 करोड 59 लाख टन का और 1980-81 में 2 करोड़ 16 लाख टन
का निर्यात किया। आस्ट्रेलिया ने 1970-71 में 1 करोड़ 19 लाख टन का और 1980-81
में 1 करोड़ 32 लाख टन का निर्यात किया। सोबियत संघ ने 1970-71 में 82 लाख टन
का और 1980-81 में कुल 11 लाख टन का निर्यात किया पश्चिम यूरोप के देशों ने
1970-71 में 86 लाख टन का और 1980-81 में 2 करोड़ 27 लाख टन का निर्यात किया।
थाईलेंड ने 1970-71 में 34 लाख टन का व 1980-81 में 55 लाख टन का निर्यात किया।
आयात करने वाले देशों में सबसे आगे 1970-71 में यूरो-~पीय आर्थिक सहायता के देश
थे, जिन्होंनें 1970-71 में यूरो-~पीय आर्थिक समुदाय के देश थे, जिन्होंने
1970-71 में 2 करोड़ 96 लाख टन खाद्यान का आयात किया था, पर वह मात्रा घटकर 1
करोड़ 77 लाख टन रह गई, जवकि इन्हीं दस वर्षों में सोवियत संघ का आयात 9 लाख टन
से बढ़कर 3 करोड़ 49 लाख टन हो गया। बंगलादेश का 3 लाख टन से बढ़कर 10 लाख टन
हो गया और चीन का 37 लाख टन से बढ़कर 1 करोड़ 57 लाख टन हो गया। भारत ने 1970-71
में 26 लाख टन का आयात किया था, 1971-72 में यह मात्रा घटकर 17 लाख
टन हो गई और अगले वर्ष 16 लाख टन। 1973-74 में भारत को 47 लाख टन का आयात करना
प़ड़ा। 1974-75 में 60 लाख टन का, 1975-76 में 69 लाख टन का,1976-77 में 41 लाख
का 1977-78 में 11 लाख टन का। 1978-79 और 1979-80 में भारत ने खाद्यान्न का कोई
आयात नहीं किया और 1980-81 में केवल 2 लाख टन का। हां, 1981-82 में उसे 25 लाख
टन का आयात करना पड़ा। वैसे, उसने 1978 में 1 लाख टन चावल का 1979 में 4 लाख टन
चावल का, और 1981 में 6 लाख टन चावल का निर्यात भी किया है। जापान ने 1970-71
में 1 करोड़ 53 लाख टन खाद्यान्न आयात किया था और 1980-81 में 2 करोड़ 81 लाख
टन। कोरिया गणतन्त्र में 26 लाख टन से बढाकर 67 लाख टन का आयात किया। हां, इस
क्षेत्र में पाकिस्तान ऐसा देश अवश्य है जो 1970-71 में 10 लाख टन अन्न आयात
करता था और जिसने 1978-79 में 22 लाख टन आयात किया था, पर 1980-81 में यह मात्रा
3 लाख टन ही रह गई।
दालों की दुनिया और चीनी की चाल
संसार में सवसे विषम स्थित दालों की है। सन 1970 में 4 करोड़ 82 लाख टन दालें
उत्पन्न होती थीं और 1980 में उनकी मात्रा गिरकर 4 करोड़ 64 लाख टन ही रह गई।
इनमें भी अधिकांश विकासशील देशों में उत्पादन होता है, जहां 1970 में उत्पादन 3
करोड़ 56 लाख टन था और 1980 में 3 करोड़ 66 लाख टन। विकसित देशों में तो उत्पादन
1 करोड़ 26 लाख टन से गिरकर 1 करोड़ 8 लाख टन ही रह गया लेकिन जहां तक खाद्य
तेलों का सम्बन्ध है, इसका उत्पादन 1970 में 3 करोड़ 97 लाख टन से बढ़कर 1980
में 5 करोड़ 98 लाख टन हो गया। चीनी के उत्पादन में भी बृद्धि हुई है। 1971 में
7 करोड़ 10 लाख टन की तुलना में 1981 में 8 करोड़ 71 लाख टन चीनी का उत्पादन
हुआ। लेकिन इस बीच चीनी की खपत में भी बहुत बृद्धि हुई और वह 7 करोड़ 27 लाख से
बढ़कर 8 करोड़ 94 लाख टन हो गई। चीनी का उत्पादन सुदूर-पूर्व के देशों में, जिनमें
भारत आता है, 1 करोड़ 13 लाख टन से बढ़कर 1 करोड़ 76 लाख टन हो गया। वस्तुत: इस
वर्ष भारत में चीनी का उत्पादन सन् 1980 के 52 लाख टन के स्थान पर 70 लाख टन
होने की आशा है।
विश्व खाद्य तथा कृषि संगठन ने 26 जनवरी 1982 को जो अन्दाज लगाया है, उसमें कहा
गया है कि जहां तक उत्तरी गोलार्द्ध का सम्बन्ध है, पाकिस्तान , श्रीलंका
अल्जीरिया और ट्यूनिसिया को छोड़कर, संसार के सारे देशों में जाडे की फसल के लिए
मौसम अनुकूल रहा। दक्षिणी गोलार्द्ध में आस्ट्रेलिया के सूखे के कारण और
अर्जें-~टीना और ब्राजील में वर्षा के कारण गेंहूं और मोटे अनाज की फसल को लाभ
पहुंचा है। दक्षिणी अफ्रीका में मौसमी वर्षा अनिय-~मित रही है। भारत में जनवरी
में जो वर्षा हुई उससे गेंहू और रवी की फसल को लाभ पहुंचा है और पाकिस्तान की
गेंहू की फसल भी लाभान्वित हुई है, लेकिन वहां गर्मियों में जो सूखा पड़ा है,
उससे सिंचाई योजना प्रभावित हुई है। इन्डोनेशिया , थाईलेंड और फिलिपिन में बांढ़
और तूफानों से धान की फसल को नुकसान पहुंचा है। श्रीलंका के चार जिलों में सूखा
पड़ा है, नेपाल और मलयेशिया के कुछ भागों मे नवम्वर की वर्षा पर्याप्त नहीं थी।
अमेरिका मे गेंहूं की फसल अच्छी रही है और यही हाल यूरोप का रहा है। कुल मिलाकर
यह अन्दाज किया गया है कि 1981 में 1 अरब
अपनी फसल को चूहों से बचाएं
-रंजन अडवानी, ईश्वर प्रकाश और आर.पी. माथुर
अखिल भारतीय कृन्तक अनुसंधान परियोजना, केंद्रीय मरू अनुसंधान संस्थान,
जोधपुर-342003
चूहे फसल को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक विज्ञप्ति के
अनुसार सारे संसार में चूहे 33 करोड़ टन चावल खा जाते हैं। इसी प्रकार अन्य
फसलों को भी ये नष्ठ कर देतें हैं। केंद्रीय मरू अनुसंधान संस्थान , जोधपुर में
अखिल भारतीय कृन्तक अनुसंधान परियोजना के अन्तर्गत पांच गांवों के 2,500 हैक्टर
क्षेत्र में कृन्तक नियंत्रण कार्य किया गया। उसका अनुभव पढ़िए इस लेख में।
जनसंख्या बृद्धि के साथ खाद्यान का उत्पाजन बढना तो अत्यावश्यक है ही लेकिन
इतना ही आवश्यक इस अन्न को हानिकारक जन्तुओं के प्रकोप से बचाना है। इस श्रेणी
में हर जगह मौजूद चूहे सभी स्तनधारियों में प्रमुख उल्लेखनीय हैं। ये अन्न
उत्पादन की सभी-अवस्थाओं को , बोने से कटाई तक तथा गोदामों में जमा धान को भयंकर
हानि पहुंचाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक विज्ञप्ति के अनुसार चूहे सारे
संसार में करीब 33 करोड टन चावल का जाते हैं। अत्यधिक संख्या के अतिरिक्त , इस
भयंकर हानि का एक और प्रमुख कारण यह भी है कि अब तक खेतों के चूहों को सामूहिक
स्तर पर वैज्ञानिक तरीकों से नियंत्रित करने के कोई विशेष प्रयास नही हुए हैं।
इसके नियंत्रण में एक और बाधा यह भी है कि चूहों को भारत में सामाजिक और धार्मिक
स्तर पर सहानुभूति की दृष्टि से देखा जाता है।
प्रशिक्षित करना और चूहा नियंत्रण को सामूहिक स्तर पर किसानो द्वारा कराना था।
घरों व खेतों में चूहा निरोधक तकनीक को समझाने के अतिरिक्त घरों व गांवों में
साफ सफाई आदि की भूमिका भी बतलाई गयी। विशेषकर इस बात पर भी ध्यान रखा गया कि
चूहा नियंत्रण का लागत : लाभ के अनुपात का भी पता लगाया गया। यह अनुपात चूहों की
संख्या इसके द्वारा किया गया नुकसान और जहां यह कार्य किया गया वहां कृषि
उत्पादन में बृद्धि ध्यान में रखते हुए निकाला गया। यह सभी आंकडें जिन गांवों में
चूहा नियंत्रण किया गया व जहां नही किया गया (कंट्रोल) की परस्पर तुलना करके
निकाले गये। चूहों द्वारा खेतों व घरों में पहुंचाई गयी हानि का मूल्यांकन और
उनका कृषकों के आर्थिक स्तर पर प्रभाव देखा गया।
इस वर्ष में चूहा नियंत्रण कार्य दो बार खरीफ (मई-जून) और रबी (नबम्बर-दिसम्बर)
फसलों की बुबाई से पहले किया गया। पहले दो दिनो के लिए खेतों में चूहे के बिलों
में बिषरहित चुग्गा (बाजरा) डाला गया ताकि जब बिषयुक्त चुग्गा डाला जाय तो चूहे
संकालुता न दिखायें। तीसरे दिन विष चुग्गा (95 भाग बाजरा + 3 भाग मूंगफली का तेल
+2 भाग जिंकफास्फाईड) करीब 6 ग्राम प्रत्येक बिल में डाला गया। घरों के लिए
0.025 प्रतिशत "वारफरिन" (मिश्रित बाजरा प्रयोग में लाया गया)
+&gt;</p>

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