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<distributor>UCREL (on behalf of CIIL)</distributor>
<pubAddress>Department of Linguistics, Lancaster University, Lancaster, LA1 4YT, UK</pubAddress>
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<pubDate>03-07-27</pubDate>
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<h.title>Grih Prabandha</h.title>
<h.author>Asha Parik</h.author>
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<pubPlace>India</pubPlace>
<publisher>Unknown - Research Publications - Jaipur</publisher>
<pubDate>1990</pubDate>
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<projectDesc>Text collected for the CIIL Corpus, subsequently integrated into the EMILLE/CIIL Monolingual Written Corpora.</projectDesc>
<samplingDesc>Simple written text only has been transcribed. Diagrams, pictures and tables have been omitted. Sampling begins at page 168 to 173.</samplingDesc>
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<creation><date>03-07-27</date></creation>
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<text><body>

<p>&lt;2400&gt;&lt;Asha-Parik-Grih Prabandha&gt;&lt;Dhananjay kumar&gt;</p>

<p>&lt;पारिवारिक विघटन के कारण
(Causes of Family Disorganisation)</p>

<p>पारिवारिक विघटन के अनेक कारण सार्वभौम प्रकृति के हैं, अत: भारतीय
परिवारों के विघटन पर भी वे पूरी तरह लागू होते हैं। आज का युग परिवर्तन
का युग है जिसमें नई-नई आर्थिक, समाजिक और वैज्ञानिक शक्तियाँ जन्म ले
रही हैं। समाज मे नए आदर्शों और मूल्यों की स्थापना हो रही है जिनके
फलस्वरूप पारिवारिक संरचना और आदर्शों में भी परिवर्तन आ रहे हैं। जो
परिवार इन परिवर्तनों से अनुकूलन करते जा रहे हैं, वे विघटन होने से बचे
हुए हैं। इसके विपरीत आचरण करने वाले रूढ़िवादी परिवार वश्रृंखलित हो रहे
हैं और विघटन के शिकार बन रहे हैं। अनुकूलता धारण करने वाले परिवारों का
स्वरूप यदि पहले से बदल रहा है तो उसे विघटन नहीं मानना चाहिए,वह तो
स्वरूप परिवर्तन है लेकिन प्रतिकूलता लिए हुए जो परिवार आन्तरिक कलह,
तनाव और संघर्ष के शिकार बने हुए हैं, उनमें विघटन की स्थिति है जो अपने
चरम रूप में भी अपने आए दिन प्रस्फुटित होती रहती है।</p>

<p>अग्रिम पक्तियों में हम उन विविध आर्थिक, सामाजिक,राजनीतिक, शैक्षणिक और
वैज्ञानिक कारणों को लेंगे जो न केवल भारतीय परिवारों वरन् विश्व के
अन्य समाजों के परिवारों को भी विघटित कर रहे हैं।</p>

<p>आर्थिक कारण</p>

<p>आज का युग आर्थिक युग है जिसमें मानव का दृष्टिकोण अधिकाधिक आर्थिक बनता
जा रहा है। वह समय दूर नहीं दिखाई देता जब हम दैनिक बोलचाल में `आर्थिक
मानव' (Economic Man) की चर्चा करने लगेंगे। यह एक स्वाभाविक और
मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि सम्पत्ति का साँप जितना अधिक हमारे मन-मन्दिर
में प्रवेश करता जाएगा, उतनी ही हमारी मानसिक शान्ति भंग होकर हमारी
स्वार्थपरता बढ़ती जाएगी। जहाँ स्वार्थ और लोभ की बहुलता होगी वहाँ त्याग
और सहिष्णुता के आधार पर स्थापित बन्धन दृढ़ नहीं रह पाएँगे। आज यहीं
स्थिति हमारे परिवारों में घटित हो रही है। भारत के संयुक्त परिवार
एक-दूसरे के लिए त्याग, स्नेह, सम्मान और परोपकारिता के तत्त्वों पर टिके
हुए हैं। अन्य भारतीय परिवारों के भी इसी प्रकार के परम्परागत आदर्श हैं।
विश्व के अन्य परिवार भी इन विचारों से अछूते नहीं हैं किन्तु वर्तमान
आर्थिक परिस्थितियों, विवशताओं और मूल्यों ने इस प्रकार के उच्च आदर्शों
पर आघात किया है कि जिससे विघटन की प्रक्रिया बहुत तेज हो गई है।</p>

<p>जिन विविध आर्थिक कारणों से आज के परिवार विघटन की ओर अग्रसर हैं, वे
संक्षेप में ये हैं--</p>

<p>(1) औद्योगीकरण--पारिवारिक विघटन के लिए आधुनिक औद्योगिक परिस्थितियाँ
बहुत कुछ उत्तरदायी हैं--</p>

<p>प्रथम, परिवार के अधिकाँश आर्थिक कार्य अन्य संस्थाओं और समितियों ने ले
लिए हैं। फलस्वरूप उत्पादक और आर्थिक इकाई के रूप में परिवार का महत्व
घटता जा रहा है और परिवार के सदस्य आर्थिक कारणों से एक-दूसरे के प्रति
घनिष्टता महसूस नहीं करते।</p>

<p>दूसरे, परिवार के कार्यशील सदस्य घर छोड़कर रोजी-रोटी के लिए दूर-दूर के
नगरों में बस जाते हैं। उन पर परिवार का नियन्त्रण नहीं रह पाता और न ही
उनमें सेवा, त्याग, सहयोग, आत्म-संयम आदि के परिवारिक गुणों का विकास हो
पाता है।</p>

<p>तीसरे, युवक-युवतियों को मिलों, कारखानों तथा अन्य औद्योगिक संस्थानों
में साथ-साथ काम करने का अवसर मिला है जिससे प्रेम-विवाह या
रोमाँटिक-विवाह होने लगे हैं। इन विवाहों की जड़ मजबूत नहीं होती। जितनी
जल्दी-जल्दी युवक-~युवती प्रेम पाश में बँधते हैं उतनी ही जल्दी वे
बिछुड़ भी जाते हैं।</p>

<p>चौथे, स्त्रियाँ भी परिवार के बाहर कमाई के लिए जाती हैं जिससे उनमें
पारिवारिक कर्त्तव्यों के प्रति उदासीनता बढ़ रही है। ये बच्चों की
समुचित देखभाल तक नहीं कर पातीं अत: आए दिन पारिवारिक कलह और तनाव होते
रहते हैं</p>

<p>पाँचवें, औद्योगीकरण से नगरों में मकानों की समस्या पैदा हो गई है। अनेक
स्त्री-पुरूष होटलों और मेस (Mess) में अपना जीवन बिताते हैं। घर बसाकर न
रहने की इस प्रवृत्ति से वे बुरी आदतों के शिकार हो जाते हैं जिनका
कुप्रभाव पारिवारिक जीवन पर पड़ता है।</p>

<p>औद्योगीकरण के इन सब प्रभावों का सामूहिक परिणाम यह निकला है कि
पारिवारिक सुख-शान्ति, पारिवारिक बन्धन तथा मेल-मिलाप शिथिल पड़ने लगे
हैं और विघटन की प्रक्रिया अधिक सक्रिय हो गई है।</p>

<p>(2) निर्धनता--भारत की वर्तमान आर्थिक परिस्थितियाँ ऐसी नहीं हैं कि
निर्धन अधिक निर्धन होते जा रहे हैं और धनी अधिक धनवान। निर्धनता
प्रत्येक समाज के लिए एक अभिशाप है क्योंकि पारिवारिक आवश्यकताओं की
पूर्ति नहीं हो पाती, मानसिक असन्तोष व्याप्त रहता है और परिवार के
सदस्यों में सदैव खींचातानी चलती रहती है। पति, बाल-बच्चों और पत्नी का
भली भाँति पालन नहीं कर पाता जिससे परिवार के सदस्यों में उसके प्रति
उपेक्षा भाव पैदा होता है। अनेक बार पत्नी को कार्य की खोज में इधर-उधर
भटकना पड़ता है और पुरुष का मन उसके प्रति शंकालु बन जाता है। समुचित
शिक्षा न मिलने से बच्चों में उद्दंडता पनपती है और पारिवारिक वातावरण
तनावपूर्ण बना रहता है। इस तरह निर्धनता पारिवारिक विघटन की दशाएँ पैदा
करती है।</p>

<p>(3) बेरोजगारी--यद्यपि बेरोजगारी सभी देशों में कुछ न कुछ मात्रा में
व्याप्त है, तथापि भारत में तो यह बहुत गम्भीर रूप धारण किए हुए है। भारत
के अधिकाँश परिवार बेरोजगारी से न्यूनाधिक रूप में पीड़ित हैं। बेरोजगारी
से निर्धनता का जन्म होता है और निर्धनता विभिन्न प्रकार के मानसिक और
पारिवारिक तनाव पैदा करती है। आजीविका का कोई प्रबन्ध न होने से
पति-पत्नी प्राय: एक-दूसरे से बिछुड़े भी रहते हैं। पुरुष काम की खोज में
भटकता रहता है और मानसिक ग्लानि के कारण कितनी ही बार दुर्गुणो का शिकार
बन जाता है। खाली बैठे रहने से शैतान अपना सिक्का जमा लेता है। परिवार की
स्त्रियों और बच्चों पर भी कोई नियन्त्रण नहीं रह पाता अत: वे भी अनैतिक
जीवन की ओर बढ़ने लगते हैं। इस प्रकार परिवार का विघटन शुरू हो जाता है।</p>

<p>(4) स्त्रियों की आर्थिक स्वतन्त्रता--आज के अर्थ-प्रधान युग में
स्त्रियाँ विभिन्न कारणोंवश आर्थिक आत्म-निर्भरता की ओर बढ़ रही हैं।
अनेक परिवारों की स्त्रियाँ इसलिए विभिन्न उद्योगों और कार्यालयों में
नौकरी करने लगी हैं ताकि पारिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके। इस
प्रकार की स्थिति प्रारम्भ में तो बड़ी सुखदायी होती है लेकिन धीरे-धीरे
इससे पारिवारिक विघटन की दशाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। नौकरी कर्त्तव्यों
और पारिवारिक कर्त्तव्यों के बीच संघर्ष पैदा हो जाता है जिससे पारिवारिक
जीवन का सन्तुलन बिगड़ जाता है। आर्थिक आत्म-~निर्भरता के कारण स्त्रियों
में स्वतन्त्र विचार जन्म ले लेते हैं और वे गृह-कार्यों में समान
अधिकारों की माँग करने लगती हैं। इसके अलावा उनमें परिवार की दूसरी
स्त्रियों के प्रति, जो कमाई नहीं करतीं, उपेक्षा भाव पैदा हो जाता है।
यह स्थिति परिवार की सुख-शान्ति को भंग कर देती है। पारिवारिक तनाव पैदा
हो जाते हैं और कभी-कभी तो विघटन अपनी चरम सीमा तक पहुँच जाता है। प्रो.
बोगार्डस (Bogardus) ने ठीक ही लिखा है, "यदि माँ ताश खेलने या नौकरी
करने या अन्य कोई काम करने के लिए सारे दिन घर से बाहर रहे तो घर का
टूटना और बच्चों का बिगड़ना एक अनिवार्य या न टाला जा सकने वाला परिणाम
होगा।"</p>

<p>(5) व्यावसायिक तनाव--पारिवारिक विघटन के लिए उत्तरदायी आर्थिक कारणों
में व्यावसायिक तनाव भी महत्त्वपूर्ण है। कुछ व्यवसायों की प्रकृति इस
प्रकार की होती है जिससे पारिवारिक और सामाजिक तनाव बढ़ते हैं तथा विघटन
की दशाएँ प्रकट होती हैं। उदाहरणार्थ, अरुचिकर व्यवसायों में काम करने से
व्यक्तियों के पद और भूमिका (Role) में सन्तुलन बिगड़ जाता है तथा मानसिक
स्थिति तनावपूर्ण हो जाती है। एक साहित्यकार सर्कस कम्पनी में काम नहीं
कर सकता और एक आदर्शवादी व्यक्ति वकील का पेशा नहीं निभा सकता। आर्थिक
दृष्टि से चाहे वह सफल हो जाए, लेकिन मानसिक दृष्टि से उसका असन्तोष बना
ही रहेगा। इसी प्रकार यदि व्यवसाय अस्थायी प्रकृति के होते हैं तो लोग
अपने को आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से असुरक्षित महसूस करते हैं। फलस्वरूप
परिवार में खर्चे आदि को लेकर नोंक-झोंक चलती रहती है और सारा पारिवारिक
वातावरण आशान्त बन जाता है। पुनश्च: कुछ व्यवसायों की प्रकृति ऐसी होती
है जिनमें स्त्री-पुरुषों को साथ-साथ काम करना पड़ता है। उदाहरणार्थ,
चल-चित्रों में अभिनेताओं और अभिनेत्रियों का निरन्तर एक-दूसरे से अति
निकट सम्पर्क बना रहता है। अस्प तालों, कॉलेजों आदि में भी इसी प्रकार
विषम-लिंगी व्यक्तियों का बहुत अधिक पारस्परिक सम्पर्क रहता है। यह
सम्पर्क स्त्री-पुरुष को कई बार प्रेम-बन्धन में बाँध देता है, लेकिन ऐसा
बन्धन कुछ समय बाद ही टूट भी जाता है। इसके अलावा इस स्थिति में
यौन-अनैतिकताओं को भी प्रोत्साहन मिलता है जिससे अन्ततोगत्वा पारिवारिक
कलह और विघटन जन्म लेते हैं। अनेक व्यवसायिक प्रतिनिधियों को अधिकाँश समय
घर से बाहर रहना पड़ता है और उनके परिवारों में पत्नी तथा बच्चों को
असन्तोष बना रहता है। संक्षेप में, व्यावसायिक तनाव पारिवारिक और सामाजिक
तनाव में वृद्धि करते हैं जिससे विघटन की प्रक्रिया तेज होती है।</p>

<p>सामाजिक कारण</p>

<p>पारिवारिक विघटन के लिये अनेक सामाजिक कारण उत्तरदायी हैं। आज व्यक्ति के
सामाजिक मूल्य और आदर्श बदलते जा रहे हैं। सामाजिक संरचना में परिवर्तन
हो रहा है। सामाजिक सम्बन्धों का स्वरूप बदल रहा है। स्त्रियाँ स्वयं को
पति की दासी न मानकर सहयोगी मानने लगी हैं। ये पुरुषों के समान ही
शैक्षणिक, राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों की माँगें करती हैं। विवाह के
जन्म-जन्मान्तर का पवित्र बन्धन मानने की भावना शिथिल पड़ती जा रही है।
अनेक परिवार और नई पीढ़ी के अधिकाँश युवक-युवती विवाह को एक सामाजिक
समझौता मानने लगे हैं। आज परिवार को मनोरंजन का क्षेत्र नहीं माना जाता।
परिवार के बाहर मनोरंजन के ऐसे साधनों में लोगों की रुचि बढ़ती जा रही है
जिसका मन और शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ता है। सामाजिक क्षेत्र में रोमाँस
अधिक होने लगा है और भी अनेक ऐसे सामाजिक कार्य-कलापों का उदय हो गया है
जिनसे मानसिक तनाव बना रहता है। यह सम्पूर्ण स्थिति पारिवारिक संगठन को
शिथिल बनाने वाली है।</p>

<p>अधिक स्पष्टता की दृष्टि से निम्नलिखित सामाजिक कारण वर्तमान पारिवारिक
विघटन के लिए उत्तरदायी माने जाते हैं--</p>

<p>(1) कार्यों की बहुलता--आज के युग में पारिवारिक आवश्यकताएँ बढ़ती जा रही
हैं जिनकी पूर्ति के लिए स्त्रियों और पुरुषों सभी पर कार्य-भार बढ़ता जा
रहा है। पुरुष को सदैव अर्थोपार्जन की चिन्ता लगी रहती है और स्त्रियों
को भी गृह-कार्य के साथ-साथ बाहर के कार्य निभाने पड़ते हैं। कार्यों का
यह बोझा दोनों ही पक्ष सह नहीं पाते, अत: उनमें मानसिक असन्तोष और तनाव
बढ़ता रहता है जो अनेक बार पारिवारिक विघटन के रूप में प्रस्फुटित होता
है। इसके अलावा व्यापारिक और औद्योगिक वर्ग स्त्रियों से कठिन कार्यों की
आशा करने लगा है। चूँकि स्त्रियाँ इस स्थिति से अनुकूलन करने में स्वयं
को असमर्थ पाती हैं, अत: पारिवारिक विघटन हो जाता है।</p>

<p>(2) बहुमुखी और प्रतिकूल उत्तरदायित्वों तथा कार्यों में
संघर्ष-सामान्यत: पत्नी का कार्य क्षेत्र घर माना जाता है और पति का घर
से बाहर। आज के युग में इस प्रकार का कार्य-विभाजन सम्भव नहीं रह गया है।
पत्नी भी आर्थिक कार्य सम्पन्न करती है और पति भी। इस प्रकार पारिवारिक
कार्यों का सम्पादन अच्छी तरह नहीं हो पाता तथा पति-पत्नी में मन-मुटाव
और संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। जब यह संघर्ष सीमा लाँघ जाता है तो
सम्पूर्ण पारिवारिक संरचना विघटित हो जाती है। वास्तव में बहुमुखी
कार्यों से आज अनेक भारतीय परिवारों में इतना असन्तोष उत्पन्न हो गया कि
वे पूर्ण विघटन की अवस्था में है।</p>

<p>(3) स्त्रियों की शिक्षा और उनके राजनीतिक अधिकार-- पाश्चात्य समाजों की
तरह ही भारतीय समाज में भी अब स्त्रियों को अधिकाधिक शिक्षित बनाने का
प्रयत्न हो रहे हैं। संविधान में स्त्रियों को पुरुषों के समान ही
आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक अधिकार दे दिए गए हैं। फलस्वरूप स्त्रियों
की दशा में सुधार हुआ है और उनके व्यक्तित्व का विकास होने लगा है, लेकिन
सुखदायी होने पर भी पारिवारिक दृष्टि से अनेक घरों में यह स्थिति दुखदायी
सिद्ध हो रही है। इसका पारिवारिक संगठन और जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ रहा
है। भारतीय स्त्रियों में अधिकाँश को अभी अधिकारों के साथ कर्तव्यों का
समुचित भान नहीं है। फलस्वरूप शिक्षित स्त्रियाँ पति के लिए प्रेमिका,
बच्चों के लिए माता, गृहस्थ के लिए गृहिणी आदि के रूप में सफल सिद्ध नहीं
हो पातीं, वे अपने विविध कर्त्तव्यों को निभा नहीं पातीं और अपने
नारी-सुलभ व्यवहार का प्रदर्शन नहीं कर पातीं। फलस्वरूप पारिवारिक कलेश
बढ़ गए हैं और अनेक परिवार विघटन की अवस्था में हैं।</p>

<p>(4) नगरीकरण--औद्योगीकरण के फलस्वरूप नगरीकरण तेजी पर है। नए-नए नगर जन्म
ले रह रहें हैं और पुराने नगरों का विकास हो रहा है। नगरों में जनसंख्या
की विपुलता, मिलों, कारखानों आदि के कारण विभिन्न प्रकार की समस्याएँ
बढ़ती जा रही हैं। शहरी जीवन इतना व्यस्त हो गया है कि लोग पारिवारिक
जीवन से कोई अपनापन या मोह अनुभव नहीं करते। शराब-खोरी जुए-बाजी,
वेश्यागमन आदि के चक्कर में भी बहुत से लोग फँस जाते हैं। पारिवारिक जीवन
पर इन सबका प्रभाव अच्छा नहीं पड़ता। यदि हम देश के बड़े-~बड़े शहरों में
परिवारों का गहराई से अध्ययन करें तो पाएँगे कि अधिकाँश परिवारों का
वातावरण दूषित, क्षुब्ध और तनावपूर्ण है। यह स्थिति पारिवारिक विघटन की
ही है।</p>

<p>(5) सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन और विभिन्नता--आज जीवन की समरसता न
होने से सामाजिक आदर्शों और मूल्यों में इतनी विभिन्नता आ गई है कि उनसे
पारिवारिक संगठन शिथिल हो रहे हैं। एक ही परिवार में हम विभिन्न सामाजिक,
आर्थिक, राजनीतिक विचारधाराओं का प्रभाव देखते हैं। माँ समाजवादी है तो
पिता साम्यवादी और बच्चा पूँजीवादी। इसी तरह आदर्शों की विभिन्नता है।
बुजुर्ग माता-पिता प्राचीन वैवाहिक और पारिवारिक आदर्शों को अच्छा समझते
हैं तो सन्तान नए आदर्शों को प्रगतिशीलता का चिह्न मानती है। जब एक ही
परिवार के सदस्यों में भिन्न-भिन्न आदर्शों और मूल्यों का बोल-बाला होता
है तो स्वभावत: उनमें मतभेद, तनाव और कलह की स्थिति आए दिन पैदा होती
रहती है। इस प्रकार का तनावपूर्ण वातावरण परिवार के सदस्यों में परस्पर
वाँछित आत्मीयता पैदा नहीं होने देता है, फलस्वरूप पारिवारिक विघटन की
प्रक्रिया शुरू हो जाती है।</p>

<p>(6) सामाजिक ढाँचे में परिवर्तन--पारिवारिक विघटन और सामाजिक ढाँचे या
संरचना में घनिष्ठ सम्बन्ध है। सामाजिक ढाँचे या संरचना द्वारा
व्यक्तियों की स्थिति, कार्य आदि का निर्धारण होता है। हमारे परिवारों का
जो परम्परागत ढाँचा है, वह हजारों वर्षों में बन पाया है किन्तु अब यह
ढाँचा लडखडाने लगा क्योंकि सम्पूर्ण समाज क्रान्तिकारी परिवर्तनों से
गुजर रहा है जिसका प्रतिकूल प्रभाव पारिवारिक संगठन पर पड़ रहा है। अनेक
परिवारों में पुरुष और स्त्रियाँ यह भी निश्चित नहीं कर पाते कि उनके
कार्य क्या है। पढ़ी-लिखी स्त्रियाँ अपने लिए पूर्व-निश्चित परम्परागत
कार्यों को अच्छा नहीं समझतीं। दूसरी ओर पति अपने परम्परागत स्थान और
सम्मान को नहीं खोना चाहता। दोनों की यह टकराहट पारिवारिक विघटन को जन्म
देती है। इसी तरह परिवार में बुजुर्गों और माता-पिता के परम्परागत महत्व
में भी परिवर्तन आ रहा है। आज माता-पिता की आवाज को उतना महत्व नहीं दिया
जाता सन्तान की इच्छा को। अधिकाँश परिवारों में यही प्रवृत्ति बढ़ रही
है। बुजुर्ग माँ-बाप का स्थान गौण होता जा रहा है। यह स्थिति आपसी तनावों
में वृद्धि करती है और पारिवारिक विघटन का कारण बनती है ।</p>

<p>(7) भौतिकवादी एवं व्यक्तिवादी प्रवृत्ति का विकास--हमारे देश में
आदर्शवाद और आध्यात्मवाद की परम्परा सदियों से चली आ रही है। भारत के
संयुक्त परिवार समष्टिवाद के प्रतीक हैं, व्यष्टिवाद के नहीं किन्तु
पाश्चात्य सम्पर्क और वर्तमान शिक्षा प्रणाली के कारण देश की नई पीढ़ी
में भौतिकवादी तथा व्यक्तिवादी विचारधाराएँ अधिकाधिक पनप रही हैं। इन
विचारधाराओं में अपने स्वार्थ की पूर्ति का सर्वोपरि स्थान है। स्वाभावत:
इस प्रकार की विचारधारा हमारे देश के परम्परागत पारिवारिक आदर्शों से मेल
नहीं खाती। फलस्वरूप हमारे पारिवारिक संगठन की जड़ निर्बल होती जा रही
है।</p>

<p>(8) विवाह के आधार में परिवर्तन--भारत की बहुसंख्यक जनता में विवाह का
परम्परागत आधार धार्मिक है। इसके अनुसार विवाह एक ऐसा पवित्र और अटूट
बन्धन है जो केवल मृत्यु पर टूट सकता है, लेकिन विवाह का नया आदर्श इसके
विपरीत है। नई पीढ़ी विवाह को एक समझौता मानने लगी है। सामाजिक विधि
विधान भी इस प्रवृत्ति को प्रोत्साहित कर रहे हैं। विवाह-विच्छेद को आज
के तथाकथित प्रगतिशील युवक बुरा मानते हैं। स्पष्ट है कि इस प्रवृत्ति के
विकास के साथ-साथ पारिवारिक विघटन भी तेज हो रहा है।
+&gt;</p>

<p></p></body></text></cesDoc>