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<pubDate>03-07-27</pubDate>
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<h.title>Daily News-16</h.title>
<h.author>Anon</h.author>
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<publisher>Unknown - Jansatta - New Delhi</publisher>
<pubDate>1987</pubDate>
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<p>&lt;2000&gt;&lt;Jansata-Daily News 16&gt;&lt;Gargi Maheshwari&gt;</p>

<p>
नई वनस्पति नीति का एलान करने से कतरा रही है सरकार
सरकार नई वनस्पति नीति की घोषणा पिछले नौ महीनों से टालती आ रही है। नवंबर 1987
में नई नीति आ जानी चाहिए थी। इस बीच सरकार की तरफ से कई मर्तवा नई नीति का
एलान करने की खबरें जारी की गई। हर बार घोषणा टांय-टांय फिस्स होकर रह गई।
नवंबर 1987 से अब तक वनस्पति उद्योग के खास मसलों पर सरकार ने उलट फेर भी किया।
वनस्पति उधोग कई जंजालों में उलझा है। सरकार न तो नई नीति का एलान ही कर रही है
और न ही वनस्पति उधोग की मांगें मानने को राजी है। सरकार की हिटलरशाही कुछ दिन
और चली तो वनस्पति उद्योग की तबाही तय है।
नई नीति के न आने से वनस्पति उद्योग अनिश्चितता के ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां से
उसे आगे जाने का सही रास्ता नहीं सूझ रहा है। ऐसा लगता है कि नई वनस्पति नीति
को लेकर खुद सरकार पशोपेश में पड़ गई है। नवंबर 87 से वनस्पति उद्योग के साथ
सरकार आंख मिचौली खेल रही है।
दरअसल वनस्पति नीति तीन मंत्रालयों के बीच उलझकर रह गई है। वनस्पति उधोग और
सरकार के बीच सबसे ज्यादा विवादास्पद मुद्दा आयातित खाद्य तेलों का आबंटन है।
वनस्पति उद्योग ज्यादा से ज्यादा विदेशी खाद्य तेल रेगुलर कोटे में हासिल करना
चाहता हैं क्योंकि इसमें खाद्य तेल 4000 रुपए टन सस्ता बैठता है।
कृषि मंत्रालय और तकनालाजी मिशन चाहते हैं कि वनस्पति उद्योग के आयातित खाध तेलों
का कोटा कम कर दिया जाए ताकि घरेलू तेलों पर उधोग की निर्भरता बढ़े और तिलहन
उत्पादकों को पैदावार की बेहतर कीमत मुहैया कराई जा सके। लेकिन रसद मंत्रालय,
कृषि मंत्रालय और तकनालाजी मिशन की तरह नहीं सोचता है। रसद मंत्रालय अच्छी तरह
जानता है कि घरेलू तेल आयातित तेलों के मुकाबले कहीं ज्यादा महंगे पड़ते है।
घरेलू तेलों की अधिक खपत होने से वनस्पति उधोग की उत्पादन लागत बढ़ेगी। और
नतीजतन वनस्पति की कीमतों में इजाफा होगा। यही वजह है कि रसद मंत्रालय ने
मुखालफत की।
वनस्पति उधोग एक अरसे से ऐच्छिक (वालंटरी) मुख्य नियंत्रण में है। वनस्पति
निर्माताओं की 20 रुपए टिन की बढ़ोत्तरी की मांग सरकार सुनी-अनसुनी करती आ रही
है। सरकार ने वनस्पति मूल्य 335 रुपए लागू जरुर कर रखा हैं। लेकिन, सच्चाई
सामने है कि खुले बाजार में इस कीमत पर वनस्पति उपभोक्ता को मयस्सर ही नहीं
होता है। बीच में तो इसके दाम 400 के करीब पहुंच गए थे।
वनस्पति निर्माताओं का कहना है कि सरकार ने जिस वक्त ये मूल्य तय किए थे उस समय
आयातित खाद्य तेलों का रेगुलर कोटा आज के मुकाबले 20 फीसदी ज्यादा था। इस बीच
ईंधन,पैकिंग और लेबर खर्च में जबर्दस्त बढ़ोतरी हो चुकी है। 1200 रुपए फी टन तक
इजाफा हो चुका है। वनस्पति इकाइयों को उत्पादन में मुनाफा तो दूर उल्टे जेब से
जा रहा है। वनस्पति उद्योग में लगी पूंजी का रिटर्न दिनोदिन गिरता जा रहा है।
औधोगिक लागत एंव मूल्य ब्यूरो(बीआईसीपी) ने 1972 में इस उद्योग पर एक रपट दी थी
जिसमें इसका रिटर्न आधा रह जाने का खुलासा किया गया था। इन सालों में स्थिति और
बिगड़ी है।
वनस्पति उत्पादकों का कहना है कि नवंबर 1987 में उद्योग को कुल जरुरत का 70 फीसदी
तेल रेगुलर कोटा में मिलता था। इस कोटे के आयातित खाद्य तेल की कीमत 15000 रुपए
टन चुकानी पड़ती थी। 14 प्रतिशत कामर्शियल कोटा(अर्थात ऐच्छिक) था जिसके तहत
विदेशी तेल की सप्लाई 19000 रुपए टन पर मुहैया होती थी।बकाया पांच प्रतिशत पूरी
करने के लिए तिल तेल इस्तेमाल करना जरुरी था। और तब सरकार ने वनस्पति के दाम
334 रुपए फी टिन मुकर्रर किया था।
लेकिन, दिसंबर 1987 जनवरी 88 में विदेशी खाद्य तेलों का कामर्शियल अर्थात् ऐच्छिक
कोटा 15 घटा कर 10 प्रतिशत कर दिया। थोड़े समय बाद ही फरवरी 1988 में मूल
नियमित अर्थात बेसिक रेगुलर कोटा भी 70 से एकदम घटाकर 50 प्रतिशत कर दिया।
वनस्पति उद्योग कोइस निर्णय ने बुरी तरह झकझोर दिया। विदेशी तेल का रेगुलर कोटा
20 फीसदी कम कर दिए जाने से वनस्पति उधोग की अर्थव्यस्था चरमरा गई। रेगुलर कोटे
में जो 20 प्रतिशत की कटौती की गई, उधोग को उस पर 4000 रुपए फी टन की बढ़ोत्तरी
झेलनी पड़ रही है। कार्मार्शयल कोटा बढ़ाकर 30 प्रतिशत कर दिया गया।
एक प्रमुख उत्पादक ने बताया कि फरवरी 88 में सरकार ने रेगुलर कोटे में 20
प्रतिशत की कटौती करते वक्त शीघ्र ही नई वनस्पति नीति घोषित करने का आश्वासन
दिया ता कि उद्योग ने मान लिया था। लेकिन सरकार वादा खिलाफी कर गई। मई में तो
सरकार ने हद कर दी. सरकार ने उदोग के संगठन इंडियन वनस्पति प्रोड्यूसर्स
एसोसिएशन (आईवीपीए) को नीति घोषित करने की बकायदा इत्तला तक कर दी थी। नीति किस
दिन घोषित की जानी थी, नीति क्या होगी, इन सब बातों की पूरी जानकारी तक एसोसिएशन
को दे दी गई थी। लेकिन एसोसिएशन आने वाली नीति के कुछेक मुद्दों पर कंपनी सदस्य
इकाईयों से सलाह मशविरा लेकर सरकार को अपने सुझाव पेस करना चाहता था। एसोसिएशन
ने इसके लिए थोड़ा वक्त मांगा। पर सरकार को न जाने क्या सूझा कि उसने बनी बनाई
नीति लिफाफे में बंद कर दी। सो आज तक नई नीति के सामने आने की नौबत ही नहीं आई।
एक उत्पादक ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पिछले छह-सात महीनों में
वनस्पति उद्योग कई समस्यओं से धिर गया है। सबसे गहरी समस्या है उत्पादन लागत का
बेतहाशा बढ़ना। इस दरम्यान उत्पादन लागत में कोई 1200 रुपए प्रति टन से भी
ज्यादा का इजाफा हिआ है। कच्चे माल में घरेलू तेल की कीमतों मे हजार रुपए टन की
बढ़ोत्तरी हुई है। निकिमल कैटालिस्ट के दाम 34000 रुपए प्रति टन बढ़े है। 1987
में अब तक कोयले पर खर्च 200 रुपए टन तक बढ़ा है। एक टन वनस्पति तैयार करने में
340 किलोग्राम कोयले की खपत होती है।
हालांकि बिजली की दरों में सरकारी स्तर पर कोई बढ़ोत्तरी इस बीच नहीं की गई है।
लेकिन, असलियत यह है कि वनस्पति उधोग में उधोग में फ्लुएल कास्ट वैरिएशन मार्च
से अब तक करीब आठ पैसा प्रति यूनिट बढा है।
उधर सरकार ने, फरवरी 1988 से वेतन बढ़ोत्तरी लागू कर दी जिससे उधोग पर प्रति
कर्मचारी 80 रुपए का बोझ और आ गया।
इस उधोग को सबसे ज्यादा मुसीबत में डाला है। कनस्तरों टिन कंटेनर की किल्लत ने।
टिन मिल ब्लैक प्लेट देश में उपलब्ध(टिन कंटेन) न होने की वजह से कनस्तरों की
भीषण कमी अभी भी छाई हुई है। दरअसल मार्च के बाद से कनस्तर इकाइयों को कच्चे माल
की सप्लाई गड़बड़ा गई और कनस्तरों का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ। तमाम
वनस्पति इकाइयों में अरसे तक उत्पादन ठप्प रहा। कइयों में क्षमता का मामूली
इस्तेमाल हे रहा है। नतीजतन, कनस्तरों की कीमतें भी बेकाबू हो गई हैं। मार्च 88
में 14किलोग्राम क्षमता का आईएसआई मार्का टिन कनस्तर के दाम सिर्फ 19-20 रुपए
थे। इस वक्त आईएसआई मार्का कनस्तर की 28 रुपए कीमत चुकानी पड़ रही है। उधोग पर
कितना फालतू बोझ बढ़ गया है इससे अंदाजा लगाया जा सकता है।
दरअसल कनस्तरों की किल्लत खत्स की जा सकती है लेकिन लालफीताशाही ऐस नहीं होने
देना चाहती।
वनस्पति उत्पादकों का दावा है कि 5,6 माइक्रोन के कोटिंग के कनस्तरों का
इस्तेमाल स्वास्थ्य के लिए कतई नुकमानदेह नहीं है। इस माइक्रोन की किल्लत भी
नहीं है। लेकिन सरकार सिर्फ 11.2 माइक्रोन के कनस्तरों को इस्तेमाल करने का
कानून लागू कर रखा है।
सरकार की बुद्धि पर तरस आता है। एक तरफ वह उधोग के 4,5 माइक्रोन कोटिंग के
कनस्तरों के इस्तेमाल की मनाही किए है। दूसरी तरफ पुराने कनस्तरों में वनस्पति
पैक करने की पूरी छूट दे रखी है। पुराने जंग खाए, कोटिंग उतरे कनस्तरों से
स्वसाथ्य को नुकसान नहीं पहुचता- ऐसा मानती है सरकार। लेकिन चूंकि उधोग 5,6
माइक्रोन कनस्तरों की अनुमति मांग रहा है इसलिए सरकार फिजूल में अड़ी हुई है।
उत्पादकों का कहना है कि 5,6 माइक्रोन कनस्तरों के इस्तेमाल से न केवल पैंकिग
लागत में 50 फीसदी तक की बचत की जा सकती है बल्कि टिन मिल ब्लैक प्लेट का आयात
घटाकर भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा बचाई जा सकती है। लेकिन सरकार को यह मामूली
सी बात समझ में नहीं आ रही है।
इन सब कारणों के एकजुट हो जाने से वनस्पति उधोग की अर्थव्यवस्था घाटे में आ गई
है।
देश में वनस्पति उधोग में कुल 12 इकाइयां है। इनकी सालाना क्षमता 14 लाख टन की है
पर अमूमन 9-10 लाख टन उत्पादन हो पाता है। ऊपर दी गई वजहों से वनस्पति उत्पादन
निरंतर घट रहा है। अप्रैल मे 82000 टन के मुकाबले मई में 75000 टन वनस्पति बना।
जून में और गिरावट आने का अनुमान है।
उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश को ही ले लें। यहां की कुल 11 इकाईयों(एक बंद है)
की दैनिक क्षमता 625 टन है। इनमें से सात इकाईयों के आंकड़े सारी स्थिति का
खुलासा करते हैं। सात इकाईयों में जनवरी 1988 में जहां 7400 टन उत्पादन हुआ था।
फरवरी में 1700 टन और मार्च में 1950 टन तक पहुंच गया। लेकिन कनस्तरों की भीषण
किल्लत और आयातित तेल का कोटा घट जाने तथा ईंधन वगैरह बुनियादी कच्चे माल की
बढ़ती कीमतों के कारण अप्रैल में सिर्फ 4140 टन उत्पादन हो पाया। मार्च के
मुकाबले जून में उत्पादन सिर्फ 40 प्रतिशत रह गया।इतनी कम क्षमता पर उत्पादन
होने से इकाईयों की लागत नहीं वसूल हो पा रही है, मुनाफा होना तो बहुत दूर की
बात है।
आखिर इसका रास्ता क्या हैं? इस प्रश्न पर उत्पादकों का कहना है सरकार अगर
335(प्रति टिन 15 किलोग्राम) के नियंत्रित मूल्य पर ही वनस्पति बिकवाना चाहती है
तो उसे आयातित खाद्य तेलों का रेगुलर कोटा कुल जरुरत का कम से कम 65 प्रतिशत करना
चाहिए तथा 20 प्रतिशत कामर्शियल(ऐच्छिक) लेकिन 50-20 के मौजूदा कोटे पर 350-355
रुपए तो उत्पादन लागत बैठ रही है। ऐसे में उद्योग पर 335 रुपए की कीमत थोपने का
मतलब है उद्योग की तबाही मौजूदा 50-30 कोटे पर उत्पादन लगात निकालना तभी संभव है
जब प्रति टिन कम से कम 20 रुपए की बढ़ोत्तरी की जाए लेकिन, सरकार आयातित तेलों
का कोटा भी घटाती जा रही है और दाम भी नहीं बढ़ाने देती। फिर भी यह समझती है कि
वनस्पति उद्योग अच्छी खासी कमाई कर रहा है।
वनस्पति उत्पादकों ने जुलाई के शुरु में नई नीति को और ज्यादा टालने की स्थिति
में उत्पादन ठप करने की धमकी भी दी, लेकिन सरकार पर इसका कोई असर नहीं हुआ।
इधर संसद का सत्र शुरु हो गया है। एक प्रमुख वनस्पति उत्पादक का कहना है कि सत्र
में सरकार बोफर्स कांड में ही इतना उलझी रहेगी कि उसे वनस्पतिनीति पर सोचने के
लिए वक्त ही नहीं मिलेगा। फाइलों में बंद पड़ी नई नीति कब आएगी यह तो वक्त
बताएगा। लेकिन वनस्पति उधोग की तबाही के दिन जरुर आ गए हैं।
नई दिल्ली 5 अगस्त। उत्तर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री नरेंद्रसिंह ने कहा है कि
बिजली के घरेलू उपभोक्ताओं की समस्यओं के हल के लिए प्रदेश में जगह-जगह शिविर
लगाए जाएंगे। श्री सिंह ने कहा कि प्रारंभिक चरण में यह शिविर इसी रविवार
प्रदेश के पांच महनगरों में लगाए जाएगे तथा शीध्र ही इस सुविधा का विस्तार अन्य
नगरों में भी किया जाएगा।मौसम खुलने पर इनका माल और अधिक मात्रा में आने लगेगा।
पशु आहार निर्माताओं की मांग न होने से ज्वार, जो तथा मक्की के भाव 5-5 रु. और
टूट गए। इसके विपरीत दालों में उड़द 10 रु. और तेज हो गए क्योंकि स्टाकिस्टों की
पकड़ मजबूत चल रही थी।मूंग, मसूर तथा अरहर के भावों में कोई खास घटाबढ़ी नहीं
हुई क्योंकि दाल मिलों की मांग कमजोर रही।
किराना-मेवे:किराना मार्केट मे जीरे के भाव अगली बुआई जोरदार होने को आशा से 100
रु. टूटकर 3400/4000 रु. प्रति क्वंटल रह गए। अगले मास तक कई क्षेत्रों में नए
माल की आवक शुरु होने की आशा से लाल मिर्चो की हाजिर मांग कमजोर रही। छोटा
इलायची भी एक ही पार्टी के पास 75 बोरी आवक होने से सुस्त रही। मेवों में बादाम
गुरबंदी हाजिर माल की कमी से 50 रु. बढ़ गया जबकि गोले में मिलाजुला रुख रहा।
खाद्य तेल: वाणिज्य राज्य मंत्री प्रियरंजन दास मुंशी ने लोकसभा में कहा कि आयातित
खाद्य तेल की खुले बाजार में बिक्री से खाद्य तेल की मूल्य वृद्धि में कमी आई है।
एक अन्य प्रश्न के लिखित उत्तर में उन्होंने कहा कि सरकार ने देशी बाजार में
कीमतों को नियंत्रित रखने के उद्देश्य से ही आयातित खाद्य तेल की खुली बिक्री की
अनुमति दी थी।
उन्होंने फिलहाल विभिन्न राज्यों को आयातित खाद्य तेलों का कोटा बढ़ाने से इंकार
किया।
सिक्के: वित्त राज्य मंत्री एडुआरार्डो फ्लोरियो ने कहा कि अप्रैल 84 मे मार्च
88 के दौरान देश में 419.20 करोड़ रुपये मूल्य के 1069.30करोड़ सिक्कों का
उत्पादन देश में हुआ ।
विदेश कर्ज: श्री फ्लोरियो ने कहा कि इस वर्ष एक अप्रैल तक देश पर 366.90 करोड़
रुपए विदेशी कर्ज था।
व्यवसाय कर: एक अन्य प्रश्न के उत्तर में बतायो कि व्यवसाय कर की सीमा में
वृद्धि करने के लिए एक प्रस्ताव पर सरकार विचार कर रही है।</p>

<p>ब्रिक्री कर चोरी के खिलाफ अभियान
जनसत्ता संवाददाता
मेरठ: 5 अगस्त। सेल्स टैक्स महकमे ने टैक्सचोरी करके दिल्ली से राज्य में माल
लाने वालों के खिलाफ कमर कस ली है। बड़ौत स्टेशन पर महकमें के अफसरों ने साठ हजार
रुपए का फरजी नाम से मंगाया गया ऐसा माल पकड़ा है। सेल्स टैक्स अफसर रामजनम राम
ने इस माल को रेलवे पुलिस को सौंप दिया।
महकमे के सहायक आयुक्त वी के चंदोला ने बताया कि टैक्सचोरी करके राज्य में लाए
जाने वाले माल पर निगरानी के लिए विशेष अनुसंधान शाखा, सचल दस्ते और सेक्टर के
अफसर-तीनों शाखाएं लगी हुई है। भड़ौत के अफसरों को इस काम के लिए एक जीप भी
मुहैया करा दी गई है।
श्री चंदोला ने बताया कि रेलवे टैक्सचोरी रोकने के काम में उनकी कतई मदद करने को
तैयार नहीं। उल्टे रेलवे की बुकिंग एजेसी और कानून की पेचीदगी का फायदा उठाकर
मेरठ में ललितकुमार जैन का गिरोह टैक्सचोरी के काम में लगा हुआ है।
उन्होंने बताया कि जैन पैसे और प्रभाव के बल पर अडंगेबाजी करता रहता है। महकमे
ने उसके खिलाफ कुछ मामलों में सत्ताईस लाख रुपए टैक्स लगा रखा है। जिसे खत्म
कराने के लिए उसने सुप्रीम कोर्ट ने याचिका सुनवाई के लिए मंजूर करने से पहले
टैक्स की आधी रकम जमा करने का निर्देश दिया। जो उसने अभी तक जमा नहीं कराई है।
उन्होने बताया कि जैन का 15 बोरियों में मेरठ से ऊंटगाड़ियों पर सरधना जा रहा
माल पिछले हफ्ते पकड़ा गया। टैक्सचोरी करके माल दिल्ली के आसपास के इलाकों में
ही ज्यादा आता है। हापुड़ में भी हाल ही मे टैक्सचोरी वाला माल पकड़ा गया था।
सहायक आयुक्त के मुताबिक मेरठ में भी टैक्स दिए बिना बाहर ले जाने के लिए तैयार
दो लाख रुपए का कटलरी का जो सामान पकड़ा गया था, उस पर तीस हजार रुपए बतौर जमानत
राशि जमा कराने के आदेश दिए गए है। पंद्रह हजार रुपया अब तक जमा हो चुका है।
+&gt;</p>

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