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<pubDate>03-07-27</pubDate>
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<h.title>Ek  Bandhak Samaj Ka Swarnmandir</h.title>
<h.author>Joshi, Prabhat</h.author>
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<publisher>Unknown - JanSatta - New Delhi</publisher>
<pubDate>1989</pubDate>
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<p>&lt;2010&gt;&lt;JanSatta-Ek Bandhak Samaj&gt;&lt;Gargi Maheshwari&gt;</p>

<p>
एक बंधक समाज समाज का स्वर्ण मंदिर
&lt;धांर्मिक स्थानों के दुरूपयोग पर रोक के लिए निकला गया अध्यादेश सिर्फ
स्वर्णमंदिर पर नहीं लागू होता। लेकिन उसमें वे दसों शर्त शामिल है जिनके पालन का
लिखित आश्वासन दिए बिना पंजाब प्रशासन ने शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी को
स्वर्णमंदिर सौंपने से इनकार कर रखा है । कमेटी भी लिखित बचन देने से मुकर गई है
और इस लिए यह अध्यादेश निकाला गया। अब सरकार चाहे तो शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक
कमेटी को स्वर्णमंदिर सौंपा जा सकता क्योंकि जिन शर्तो को उसने मानने में इंकार
किया था वे उस पर अध्यादेश के जरिए लागू कर दी गई हैं। लेकिन क्या इस अध्यादेश
के बाद भी शिरोमणि कमेटी स्वर्णमंदिर को आंतकवादियों का ,अड्डा, हथियारों और
गोला वारूद का जखीरा और भारत के खिलाफ खालिस्तान का दफ्तर बनने से रोक सकती हैं?
और क्या पंजाब प्रशासन इस अध्यादेश को शिरोमणि कमेटी के सक्रिय और स्वच्छिक
सहयोग के बिना लागू कर सकता है?
आपरेशन ब्लू स्टार और ब्लैक थंडर इसलिए हुए की गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी ने
स्वर्णमंदिर की पवित्रता और मर्यादा का कोई ख्याल नहीं रखा और सरकार देश के
सीधे-सादे और पुराने कानूनों को भी लागू नहीं कर पाई। यह कहना परिस्थिति को बेहद
सीधी सरल बताना नहीं है। पिछले कोई तीस पैंतीस साल से लगातार कोशिश होती रही है
कि स्वर्णमंदिर राजनीति का केन्द्र बनाया जाए और उसे देश के आम कायदे कानूनों से
ऊपर माना जाए। यह कोशिश जत्थेदार और ग्रंथियों ने नहीं; गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी
के पदाधिकारियों अकाली दलों और कांग्रेस के नेताओं ने की है। अंग्रेजों के जमाने
से चली आ रही पंजाब की सांप्रदायिक राजनीति को आजादी के बाद एक ऐसे स्वर्ग की
जरूरत थी जहां से धर्म को सत्ता राजनीति की सेवा में लगाया जा सके। इसलिए
अकालियों ने गुरद्वारा प्रबंधक कमेटी कभी अपने हाथ से निकलने नहीं दी और कैरों से
लेकर बरनाला तक पंजाब के सब मुख्यमंत्री उस पर कब्जा करने की कोशिश करते रहे।
यह कोई कोरी कहावत नहीं है कि जिस किसी के पास स्वर्णमंदिर होगा, पंजाब में वही
राज करेगा। और यह ताकत स्वर्णमंदिर में चढ़ावे में आने वाले करोड़ रूपयों से नहीं
आती। यह स्वर्णमंदिर के राजनैतिक इस्तेमाल से मिलती है। राजनेताओं ने
स्वर्णमंदिर को राजेय की कानून और व्यवस्था की ताकतों के खिलाफ उस बच्चे या औरत
की तरह सामने कर दिया है जिस पर गोली नहीं चलाई जा सकती और जिसकी कीमती जान को
ढ़ाल बनाकर वे पकड़े जाने से बच सकते हैं। स्वर्णमंदिर की पवित्रता और मर्यादा
अकाली नेताओं के लिए निष्ठा की नहीं राजनैतिक इस्तेमाल की ढाल-तलवारें रही
है। कांग्रेस ने पहले तो कोशिश की कि इन ढ़ाल-तलवारों का इस्तेमाल वह भी कर सके।
इसलिए उसकी सरकारों ने स्वर्णमंदिर की पवित्रता और सिखों की भावनाओं के नाम पर
जरूरी प्रशासनिक कार्रवाई करने में हमेशा देर लगाई और की भी तो माफी मांगते हुए
और एक अपराध बोध के साथ। कोई तीस-पैंतीस साल पहले आंदोलनकारियों को पकड़ने गई
पुलिस के स्वर्णंदिर परिसर में जाने के "पाप" की माफी मांगने के लिए पंडित नेहरू
ने मुख्यमंत्री सच्चर को मत्था टेकने को भेजा था। ज्ञानी जैल सिंह के जमाने में
स्वर्णमंदिर और सरायों के बीच सड़क भी तीर्थ का हिस्सा मान ली गई। और डी आई जी
अटिंवाल के हत्यारों को पकड़ने को लिए दरबार सिंह ने पुलिस को अंदर जाने नहीं दिया।
लेकिन जब कांग्रेस को विश्वास हो गया के अकाली उसे स्वर्णमंदिर का इस्तेमाल नहीं
करने देंगे तो उसकी सरकारों ने ऐसी परिस्थितियां बना दीं जिनमें वह राष्ट्र के
खिलाफ लड़ाई के किले के रूप में देश को दिखाया जा सके। शुरू से अकालियों के
नियत्रंण में रही शिरोमणि कमेटी ने स्वर्णमंदिर को ऐसी परिस्थिति से बचाने की
कोई कोशिश नहीं की।
आजादी के बाद से अकाली अपने लगभग सारे राजनैतिक स्वर्णमंदिर से निकालते रहे हैं।
और हमें याद रखना चाहिए कि भिंडरावाले के लोग भी दस साल पहले बैसाखी के दिन
निरंकारियों के संमाग को रोकने के लिए स्वर्णमंदिर से ही गए थे। इस दिन हुए
खून-खच्चर नें भिंडरावाले को निरंकारियों के खिलाफ धार्मिक जिहाद चलाने कि
प्रेरणा दी। इसी स्वर्णमंदिर के सराय में जनरैल सिंह भिंडरावाले दमदमी टकसाल के
मामूली प्रधान से संत भिंडरवाले बने और उन्हें तोहड़ा ने निकाल तखत में बैठाया
और वे अपने आप को ग्यारहवें गुरूजी तरह सिखों के सामने पेश करने लगे। भिंडरावाले
ज्ञानी जैल सिंह के आदमी माने जाते थे और उनके साथी अमरीकासिंह रैया से अकाली
उमीदवार के खिलाफ शिरोमणि कमेटी का चुनाव लड़े थे। 1979 के उस चुनाव में
भिंडरावाले कांग्रेस ऐजेंट थे, लेकिन जब वे एक नए धार्मिक उन्माद के
संत-सिपाही-नेता हो गए तो शिरोमणि कमेटी के अध्यक्ष ने ही उन्हे गिरप्तारी से
बचाने के लिए अकाल तखत में बैठाया। संत भिंडरवाले मामूली धर्म प्रचारक से
भस्मासूर बने तो इसीलिए की उनके इस्तेमाल के लिए कांग्रेस और अकाली दल समान रूप
से उत्सुक थे।
जब संत भिंडरवाले को अपना महत्व समझ में आ गया तो वे भी स्वर्णमंदिर का
स्वतंत्र रूप ससे इस्तेमाल करने की कोशिश करने लगे और शिरोमणि कमेटी और अकाली दल
में हिम्मत नहीं थी कि उन्हें रोक पाते । संत भिंडरावाले पहले उग्रवादी थे
जिन्होंने स्वर्णमंदिर को बंधक बना कर सिख समाज शिरोमणि कमेटी , अकाली दल, पंजाब
और केन्द्र की सरकारी को फिरौती देने पर मजबूर किया। उनकी पकड़ से स्वर्णमंदिर
को छुड़ाने के लिए देश की लागातार कीमत चुकानी पड़ रही है। आपरेशन ब्लैक थंडर इसकी
सबसे ताजा किस्त थी। कोई नहीं जानता की संत भिंडरावाले के प्रेत को कब तक
फिरौती देनी पडेगी। लेकिन जब तक सिख समाज धार्मिक उग्रवाद के आंतकवादी उन्माद से
मुक्त नहीं तब तक स्वर्णमंदिर पर आतंकवादियों की पकड़ बनी रहेगी।यह सही है कि
स्वर्ण मंदिर की पुलिस घेरेबंदी के खिलाफ कूच करने वैसे एकिकृत अकाली दल के
नेताओं और मुख्यग्रंथियों के साथ आम सिख नहीं आए। लेकिन एक बरनाला को छोड़कर किसी
सिख नेता ने उन आंतंकवादियों की निंदा नहीं की जो जान बचाने के लिए हरमंदिर
साहिब में जा घुसे थे और जहां उन्हेने टट्टी-पेशाब करना भी गलत नहीं समझा। हो
सकता है कि आतंकवादियों को स्वर्णमंदिर से निकाल जाने पर सिख समाज ने तय किया हो
कि अब बह स्वर्णमंदिर को आतंकवादियों का अड्डा बनने ही नहीं देगा। स्वर्णमंदिर
में अपनी पराजय का बदला ये कायर हत्यारें उड़ीसा, बिहार और उत्तर प्रदेश से आए
निहत्थे मजदूरों को मार कर लेते रहे। लेकिन न तो उन्हें कही रोका गया न सिख
नेताओं ने इन हत्याओं की निंदा की। आतंकवादियों का हथियार डालना उनके खिलाफ एक
नई मुहीम की शुरूआत का मौका था लेकिन किसी अकाली नेता ने कोई पहल नहीं की।
अमरिदरसिंह ने जरूरी कहा की अब मेल मिलाप और सहयोग का दौर शुरू होना चाहिए लेकिन
उसकी पहल उन्होने भी सरकार पर छोड़ दी। शिरोमणि कमेटी के छुटभैया नेता
स्वर्णमंदिर में आतंकवादियों की कारगुजारी से शर्मिदा होने के बजाय आपरेशन ब्लैक
थंडर के लिए सरकार को कोसते रहे।
शिरोमणि गुरद्वारा प्रबंधक कमेटी ने सरकार को लिखित वचन सिर्फ इसलिए नहीं दिया
कि उसके बड़े नेता जेलों में बंद हैं और उनकी राय लिए बिना ऐसा कोई वचन नहीं दिया
जा सकता। उसके कार्यवाहक अध्यक्ष ने कहा कि स्वर्णमंदिर को आतंकवादियों से मुक्त
रखने में सरकार के साथ सहयोग करने का लिखित वचन अगर वे दे दें तो उन पर सरकारी
ऐजेंट होने का अभियोग लग जाएगा। यानी अभी भी शिरोमणि कमेटी को आतंकवादियों के
आरोपों का डर है। और कमेटी के सदस्य मानते हैं कि सिख समाज उनका सरकार के साथ
सहयोग करना पसंद नहीं करेगा भले ही वह स्वर्णमंदिर की पवित्रता और मर्यादा बनाए
रखने के लिए हो। उनको इसका डर नहीं है कि आतंकवादियों ने स्वर्णमंदिर में जो कुछ
किया उसके लिए सिख समाज उन्हें जिम्मेदार मानता है और चाहता है की आगे से वे ऐसा
न होने दें। सिख जनमत का अगर ऐसा डर शिरोमणि कमेटी के लोगों में होता तो वे
आतंकवादियों के खिलाफ सरकार से सहयोग करने को तैयार हो जाते।लेकिन कमेटी के रवैए
से जाहिर है कि वह अभी आतंकवादियों के खिलाफ कोई स्टैंड नहीं ले सकती। अगर सिख
जनमत आतंकवादियों द्वारा स्वर्णमंदिर के दुरूपयोग बल्कि मर्यादा भंग के खिलाफ है
तो कमेटी को यह डर क्यों है?
कहना जरूरी नहीं की कमेटी के सदस्य कायर है और उन्हें स्वर्णमंदिर और दूसरे
ऐतिहासिक गुरद्वारा का प्रबंध करने का बजाय अपनी जान बचाने की ज्यादा फिकर है।
पिछले दो-ढ़ाई साल से कमेटी अपनी बैठकें तक अपने मुख्यालय जानी स्वर्णमंदिर में
कर नहीं सकती। वह कभी चंडीगढ में बैठकें करती तो कभी कहीं और। जनवरी 86 के सरवत
खालसा में एक मंथक कमेटी बनाई गई जिसमें शिरोमणि गुरद्वारा प्रबंधक कमेटी को
समाप्त मान कर उसके सारें अधिकार हथिया लिए। इस कमेटी ने शिरोमणि कमेटी के
नियुक्त किए गए मुख्यग्रंथियों और जत्थेदारों को बरखास्त कर दिया और उनकी जगह नई
नियुक्तियां कीं। रोडि की रिहाई के बाद शिरोमणि कमेटी ने उन सभी नियुक्तियों की
पुष्टि कर दी जो पंथक कमेटी ने की थी। शिरोमणि कमेटी और एकिकृत अकाली दल के पूरे
समर्थन के बावजूद दर्शनसिंह रागी स्वर्णमंदिर में टिक नहीं सके और धोषणाएं भले
कितनी ही हुई  रागी के वे दुवारा अकाल तख्त पर नहीं बैठा सके। सब जानते है की
शिरोमणि गुरद्वारा कमेटी की न स्वर्णमंदिर में चलती है न दूसरे किसी ऐतिहासिक
गुरद्वारा में। उसने अपने सारे अधिकार आतंकवादियों के सामने निलंबित कर दिए हैं।
पहले जब शिरोमणि कमेटी ने आंखे दिखाने की कोशिश की थी तो आतंकवादियों ने साफ कह
दिया था कि उसका जनादेश 1983 में ही खत्म हो गया है और उसके सदस्य कमेटी के
पैसों से निजी जायदाद बना रहे हैं। कुछ सदस्यों कि हत्या करके उन्होंने कमेटी को
ऐसा आतंकित कर दिया कि बह चुप होकर बैठ गई।
 कमेटी के सदस्य जानते हैं कि ज्यादातर आतंकवादी गुट और उनके नेता अभी सही सलामत हैं और पाकिस्तान या पंजाब
में कहीं बैठ है और कभी भी हमला कर सकते हैं। सुरक्षा बलों ने कुछ आतंकवादियों
से स्वर्णमंदिर में भले ही हथियार डलवा लिए हों लेकिन बाहर अभी भी उनकी बंदूके
आग उगल रही हैं और इसलिए उनके खिलाफ सरकार के साथ सहयोग करने का मतलब आज नहीं
तो कल अपनी जान गंवाना है।इसलिए सरकार को लिखित वचन देने के बजाय उन्होंने एक
अध्यादेश का अपने उपर लागू होना पंसद किया। चूंकि ऐतिहासिक गुरद्वारा में कारगर
नियंत्रण आतंकवादियों का है इसलिए मान लेना चाहिए की अगर सरकार अध्यादेश को
सचमुच लागू करेगी तों गुरद्वारों का वास्तविक प्रबंध उसे खुद करना प़ड़ेगा। इस
मायने में शिरोमणि कमेटी का लिखित वचन न देना ठीक ही था क्योंकि वह चाहे भी अपने
बूते पर ऐसे वचन को निभा नहीं सकती। अब अगर सरकार अध्यादेश को सख्ती से लागू करे
तो उसे खुद स्वर्णमंदिर सहित सभी ऐतिहासिक गुरद्वारों का वास्तविक प्रबंध
आतंकवादियों से छिनना होगा।कमेटी विरोध करते हुए गुरद्वारों का प्रबंध सरकार के
देख-रेख में कर सकती हैं। यानी आतंकवादियों को गुरद्वारों का इस्तेमाल न करने
देने में अगर सरकार शिरोमणि कमेटी को अगुआ बनाना चाहती हो तो न तो उसमें ऐसा
करने की ताकत है न वह इस के लिए तैयार है। आतंकवादियों ने उसके हाथ से प्रबंध
छिना तो उसने छिन जाने दिया और विरोध भी नहीं जताया। अब अगर सरकार स्वर्णमंदिर
और दूसरे गुरद्वारों का प्रबंध अपने हाथ में ले ले तो इसी को रोकने की ताकत
उसमें नहीं है। हां, वह इसका विरोध जरूरी करेगी क्योंकि सिख होने की कारण
आतंकवादियों के सब गुनाह माफ हैं और सरकार होने का कारण उसका कोई भी कदम पुण्य और
पंथ की रक्षा का नहीं हो सकता।सिख नेताओं और संस्थानों के इस रबैए के चलते सरकार
को उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि अध्यादेश को अमल में लाने में उसे उनका सहयोग
मिलेगा। सिख नेताओं और संगठनों में न इच्छा है न ताकत है कि वे गुरद्वारा कों
दुरूपयोग से बचा सकें। सरकार और देश का जनमत बहुत ही मुखर हुआ तो वे कहने लगेगे
कि शक में तो धर्म और राजनीति को अलग किया ही नहीं जा सकता। यानि धार्मिक
स्थानों के दुरूपयोग को रोकने के लिए निकाला गया अध्यादेश सिक्ख के खिलाफ है और
सिखों पर किया गया एक और अत्याचार है।
शिरोमणि गुरद्वारा प्रबंधक कमेटी, अकाली दल और धार्मिक सिख प्रतिष्ठान
आतंकवादियों के सामने अपनी असहायता, दयनीयता और अप्रासंगिकता कई बार बता चुके
हैं। मौजूदा सिख नेताओं के चलते इसकी कोई संभावना नहीं है कि सिखों की ये
पारम्परिक लोकतांत्रिक संस्थाएं आतंकवाद और अलगाववाद के खिलाफ
लोकतांत्रिक ताकतों की मदद कर सकें। शिरोमणि कमेटी 1079 में चार साल के लिए चुनी
गई थी। उसका जनादेश खत्म हुए पांच साल हो गए। अकाली दल ने 1975 के चुनाव में लगभग
दो तिहाई बहुमत मिता था लेकिन सात महीने में वह दो-फाड़ हो गया और केन्द्र की
बैसाखी पर कोई एक साल और चलने के बाद उसकी सरकार बर्खास्त कर दी गई।इसके तरह
अकाली दल ने अपना जनादेश डेढ़ साल में ही बरबाद कर लिया। धार्मिक प्रतिष्ठान ने
पहले राजनीतिकों और फिर आतंकवादियों के हुक्म पर मचल कर अपनी स्वतंत्र सत्ता गंवा
दी। आतंकवादियों ने जब अकाल तखत के जत्थेदार दर्शनसिंह रागी को स्वर्णमंदिर से
खदेड़ा तो सिख समाज ने इसका कोई विरोध नहीं किया और न जसबीरसिंह रोड़े के
जत्थेदार बनाए जाने पर खुशी प्रकट की मानना गलत नहीं होगा कि ये सभी संगठन सिख
समाज के लिए अप्रासंगिक हो चुके हैं। फिर सरकार इनकी चिंता क्यों करे और देश के
उदार बुद्धिजीवी इनसे क्यों उम्मीद किए बैठ हैं।
सिख समाज आतंकवादियों के साथ नहीं है। अगर होता तो अब तक पंजाब सिख हिन्दू दंगे
में जल रहा होता, और हिन्दुओं के वहां भागने और सिखों के सारे देश से पंजाब आने
के कारण अनौपचारिक खलिस्तान बन चुका होता। कोई आठ साल से लगातार बढ़ते जा रहे
आतंकवाद के बावजूद पंजाब में सांप्रदायिक दंगे न होना आम सिखो के खालिस्तान के
खिलाफ होने का ही सबूत है। लेकिन कोई उम्मीद करे कि नेतृत्वहीन सिख समाज अपनी ही
आतंकवादियों से लड़कर उन्हें समाप्त करे तो यह भी नहीं होने का ।
सिख समाज को भी आतंकवादियों ने डरा-धमकाकर बंधक बना लिया है।
देश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक ताकतें अगर आतंकवादियों से निपट लें तो सिख
नेता चाहे जितना हल्ला मचाएं सिख समाज उनका विरोध नहीं करेगा। यह सही है कि
शिरोमणि गुरद्वारा प्रबंधक कमेटी के बिना गुरद्वारा का प्रबंध नहीं हो सकता और
अकालियों के बिना पंजाब में राजनीति नहीं चल सकती। लेकिन ऐसा हो सके इसके लिए
पहले आतंकवाद को हरा कर मिटाना जरूरी है। राजीव गांधी अगर सभी राजनैतिक
पार्टियों और देश भर के जनमत को पंजाब में आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई में एकजुट
कर सकें तो यह काम  आसान हो सकता है।
वायुदूत सेवा के बहाने
मई के दूसरे हफ्ते से यह चर्चा सतना और रींवा में शुरू हो गई थी कि दोनों शहरों
में बहुप्रतीक्षित वायुदूत सेवा का शुभारम्भ चौदह-पंद्रह मई को होगा। इस चर्चा
में बायुदूत सेवा का महत्व कम था और विशेष जोर इस बात पर था कि माधवराव सिंधिया
और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा इसका उदघाटन करने आ रहे हैं।
सतना में वायुदूत सेवा शुरू होना एक प्रतिष्ठा का प्रश्र बन गया था। पिछले दो
वर्ष से कभी अखबारों में छपता था कि सतना हवाई मार्ग से जुडेगा तो कभी उड्डयन
विभाग की ओर से ऐसी खबरों के बारे में अनभिज्ञता प्रकट कि जाती थी। बल्कि जोर
देकर कहा जाता था कि अभी सतना हमारे नक्शे में नहीं है। सतना के विधायक लालता
प्रसाद खरे अनेक माध्यमों से वायुदूत के पीछे लगे रहे और चौदह मई को वायुदूत
सतना की हवाई पट्टी पर उतरा। पंद्रह मई को रींवा में भी इस सेवा का शुभारंभ हो
गया। सिंधिया और वोरा हैं तो कांग्रेस (इ) के ही, पर उनका यह दौरा स्थानीय
राजनीति में मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के खिलाफ माना गया। सतना और रींवा कि हवाई
पट्टी पर हर बार दिखाई देने वाले चेहरे गायव थे। सतना में मंत्रियों का स्वागत
करने काफी भीड़ जमा हो गई थी। जनसभा में भी खासी भीड़ इकठ्ठी थी। प्रदेश के पूर्व
मंत्री कैप्टन जयपाल सिंह विट्ठल भाई पटेल चंद्रकुमार भानोट और एकमात्र महिला
नेत्री विद्यावती चतुर्वेदी कार्यक्रमों में शामिल हुए। सतना के सांसद अजीज
कुरैशी ने बड़ा जोरदार भाषण दिया चिल्ला-चिल्लाकर। गरिवों-दलितों और
बेरोजगारों का भवषिष्य-निर्माण करने के बारे में उनके उद्गारों पर हवाई पट्टी पर
उपस्थित संभ्रांत नागरिक, पत्रकार, अधिकारी सभी बरबस हंस दिए। उनका सतना शहर
में आना कभी-कभार होता है। सतना के कार्यक्रम में बैरिस्टर गुलशेर अहम्मद भी
अन्य असंतुष्ट कांग्रेसियों के साथ थे। सतना में वायुदूत सेवा शुभारंभ करीब दो
धंटे देरी से हुआ क्योंकि सतना "लोकेट" करने में काफी समय लगा। सतना हवाई पट्टी
पर जनसाधारण ने भी अंदर आकर वायुदूत करीब से देखा, कुछ ने तो उसे छुआ भी। हवाई
पट्टी पर जिला प्रशासन के सभी बरिष्ठ अधिकारी अपने सहयोगियों के साथ मौजूद थे।
कार्यक्रम में सिर्फ एक वार युवा कांग्रेस के सदस्यों की नारेबाजी और उत्साह को
देखकर लगा यह गडबड़ी फैलाने के लिए जानबूझ कर किया जा रहा है। अधिकारियों ने
सूझबूझ से काम लिया और कोई अप्रिय घटना नहीं घटी। दिनांक 15 मई की सुबह 8 बजे
रींवा हवाई पट्टी चोरहटा पर वायुदूत सेवा का शुभारंभ था। वहां का नजारा सतना में
एकदम उलटा था। रास्ते में कई दूर-दूर तक स्वागत द्वार नहीं। कहीं भी पुलिस के
बांवेजवान दिखाई नहीं दिए।
अखबारों में प्रकाशित विवरण पढ़़ कर पता चला कि जिला प्रशासन कार्यक्रम के इंतजाम
में पीछे ही रहना चाहता था। मंत्री जब कार में उतरे तो उनके चेहरे पहले दिन
सतना में जितने ताजे दिखे थे वैसे नहीं थे। रीवां की राजनीति का असर हो चुका था।
इंतजाम और भीड़ देखकर उनका उत्साह और थोड़ा कम हुआ। रींवा का एक भी चिर-परिचित
कांग्रेस चेहरा हवाई पट्टी पर दिखाई नहीं दिया। हां एक चेहरा काफी दिनो बाद वहां
दिखा वह पूर्व स्वास्थ मंत्री श्रीनिवास तिवारी का था। सतना की तुलना में रींवा
के नेता काफी डरपोक निकले, एक भी नहीं आया। सत्ता पक्ष के वर्तमान विधायकों में
से एक भी उपस्थित नहीं था। बस उपस्थिति में राजमणई पटेल। राज्य सरकार द्वारा
सौंपी गई जिम्मेदारी जो निभानी थी उन्हें। भाषण यहां भी सतना की तरह ही हुए पर
संक्षिप्त और वक्ता भी सिर्फ श्रीसिंधिया, श्री पटेल और वायुदूत सेवा के मैनेजिंग
डायरेक्टर हर्षवर्धन थे। इस तरह राजनीति की खीचतान के बीच संपत्र वोरा- सिंधिया
की रींवा-सतना यात्रा और वायुदूत सेवा का शुभारंभ। वायुदूत सेवा के बार में कई
प्रश्र चिन्ह हैं। कब से नियमित शुरू होगी? क्योंकि अभी तक हवाई पट्टी की
सुरक्षा अस्थायी ही है। पट्टी में भी सुधार की जरूरत है। उदघाटन करके मंत्री चले
गए वायुदूत सेवा शहर में लाने वाले नेताओं की प्रतिष्ठा बनी रही, अब वायुदूत
नियमित उड़े चाहे न उड़े। जो लोग इसका लाभ उठाना चाहते हैं वे अब इसकी नियमित
उड़ान की प्रतीक्षा में बैठे हैं। दोनों शहरों में बदइंतजामी के बीच शुरू की गई इस
सेवा का उद्देश्य सिर्फ एक था-अर्जुन सिंह समर्थकों को अपनी शक्ति से परिचित
कराना।मंत्रियों की यात्रा अपने असली उद्देश्य में कहां तक सफल रही यह तो
मंत्रिगण ही जानते होंगे। हमने तो इतना देखा कि प्रदेश कि सत्ता में बने रहने का
इच्छुक हर व्यक्ति इस आयोजन से दूर भागा और जितने भी व्यक्ति आयोजन के आसपास
दिखे वे या तो तथाकथित असंतुष्ट दल के कांग्रेसी थे या मजबूरन अपना कर्तव्य
निभाने वाले जिला प्रशासन के अधिकारी।
+&gt;</p>

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